Thursday, 30 March 2017

WHAT IS NATIONAL CAREER SERVICE

National Career Service (NCS) project is an initiative launched by the Ministry of Labour and Employment (India)Government of India as a Mission Mode Project for establishing quick and efficient career related services. It was launched by Prime Minister Narendra Modi on 20 July 2015 as part of government’s focus on providing right skills and generating employment.

The key success factors of NCS initiative revolve around strengthening the existing employment exchange ecosystem with an ICT enabled platform and reaching out to masses through multiple delivery channels and partnerships with existing job market players. Caught in a vicious cycle of decreasing job seeker registrations and vacancy notifications by employers, these exchanges needed a transformation for better delivery of employment services. Employment exchanges have been transformed to focus more on counselling related needs of candidates with establishment of career centers

The Career Centres will serve as a platform for addressing all career related needs of the youth and students seeking counselling, job search assistance services and employment.

NCS is the converging point for Government of India's three major initiatives, Skill India, Digital India and Make in India, that aim to provide skilled manpower, improve digital infrastructure and generate employment opportunities for all.

NCS Program 

Prime Minister Narendra Modi launched the National Career Service program on 20 July 2015 at the Forty Sixth Labour Conference with an objective of supporting varied stakeholders with better career information, easily available/readily accessible jobs and other employment related services. Its vision is to provide a national platform for interface between stakeholders for responsive, transparent and efficient employment services in order to meet skill needs of a dynamic economy. The NCS program is accessible through web based/mobile interface and provides a large number of employment related services to the Indian populous. These services are supported by a call center/helpdesk and are accessible through a network of institutions like CSCs (Common Service Centers), Career Centers etc. It provides various career related services like - job search, career counselling, information on skill training programs/career options, job postings,organize and participate in job fairs, finding blue collared local service providers (LSPs) like plumbers, electricians etc. This ambitious project, aspires to be a one-stop-solution for all job seekers as well as employers

The modern way: mental health law can be used to strengthen (शक्ति बढ़ाना) primary care
MARCH 30, 2017 

The government should use the new mental health law to strengthen primary care

The passage of the Mental Healthcare Bill in the Lok Sabha, putting it on course to become law and repealing (निरस्त) the Mental Health Act of 1987, will potentially ( सम्भवतः) help India catch up (पकड़ो) with the advances made in the field by other countries. India urgently (तुरत) needs to make a transition (परिवर्तन) from old-fashioned approaches (दृष्टिकोण) to providing (उपलब्ध कराना) care for those suffering (कष्ट) from mental illnesses, something that China, for example, has achieved through state-led policy reform. Even the sketchy (अधूरा) studies on the nature of care available to Indians indicate (इशारा करना) that in terms of population coverage the new law faces a big challenge. The country’s grossly (काफी) inadequate (अपर्याप्त) base of professional resources is evident (प्रकट) from its ratio of 0.3 psychiatrists (मनोचिकित्स्क) for 100,000 people with marginally higher numbers taking independent private practitioners (चिकित्सक) into account, compared (तुलना) to China’s 1.7. Then there are massive deficiencies (भारी कमी) in the availability (उपलब्धता) of trained clinical psychologists (मनोचिकित्सक)  and psychiatric (मनोविकृती सम्बन्धी) social workers. Evidently (स्पष्ट रूप से ), the National Mental Health Programme has not been sufficiently (पर्याप्त) funded within the health budget; neither has capability been built in most States to absorb the meagre allocation.  (अल्प आवंटन को अवशोषित करना ) delayed though it is, the new legislation (कानून) can bring about change with its positive features. The important provisions (प्रावधान) relate to the recognition (मान्यता) of the right to medical treatment (उपचार), decriminalisation of attempted (पहल) suicide (आत्महत्या), explicit acceptance (स्पष्ट स्वीकृति) of agency of people with mental illness (मानसिक बीमारी) and their freedom to choose treatments, prohibition (निषेध) of discrimination (भेदभाव) and regulation  (विनियमन )of establishments (स्थापना) working in the field.

Raising effective (प्रभावकारी) primary and district-level coverage of mental health services for the general population, without requiring people to travel long distances to see a specialist and get medicines, should be a priority. Since the base of psychiatrists is low in relation to the need, the use of trained general practitioners as the first line of contact assumes (रूप धारण करना) importance. Some studies show many of them are not confident enough with their training to detect, diagnose and manage mental illnesses. With a concerted effort, (ठोस प्रयास,) primary care physicians can be trained to help people with mild (सौम्य) and severe problems, ranging from anxiety disorders (घबराहट की बीमारी) to depression (उदास), psychoses (मनोचिकित्सा) and conditions (शर्ते) arising from alcohol and substance abuse (मादक द्रव्यों का सेवन). Being able to get professional counselling will reduce the complications (जटिलताओं) arising from extreme stress (अत्यधिक तनाव), often the trigger for suicide. Extending(विस्तार) health insurance cover is also a step forward,trigger for suicide since out-of-pocket expenditure has risen along with the expansion (विस्तार) of the private sector in this sphere, just as for other ailments (तत्व). The provision in the new legislation prohibiting seclusion (एकांत) of patients, something that is frequently resorted to in asylums, and the general use of electro-convulsive (उत्तेजित) therapy must be welcomed. Modern treatment approaches (दृष्टिकोण) rely more on family and community support. The new Central and State regulatory (विनिमायक) authorities (प्राधिकरण) should speedily weed (खरपतवार) out shady non-governmental rehabilitation (पुनः प्रतिष्ठा) organisations (संगठन) in this field.
GST
अत्यन्त महत्वपूर्ण जानकारी 

क्या है जीएसटी?

➡ जीएसटी एक ऐसा टैक्स है जो राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी सामान या सेवा की मैन्युफैक्चरिंग, बिक्री और इस्तेमाल पर लगाया जाता है। इस सिस्टम के लागू होने के बाद चुंगी, सेंट्रल सेल्स टैक्स (सीएसटी), राज्य स्तर के सेल्स टैक्स या वैट, एंट्री टैक्स, लॉटरी टैक्स, स्टैंप ड्यूटी, टेलिकॉम लाइसेंस फी, टर्नओवर टैक्स, बिजली के इस्तेमाल या बिक्री पर लगने वाले टैक्स, सामान के ट्रांसपोटेर्शन पर लगने वाले टैक्स इत्यादि खत्म हो जाएंगे।


इस व्यवस्था में गुड्स और सविर्सेज की खरीद पर अदा किए गए जीएसटी को उनकी सप्लाई के वक्त दिए जाने वाले जीएसटी के मुकाबले अजस्ट कर दिया जाता है। हालांकि यह टैक्स आखिर में कन्जयूमर को देना होता है क्योंकि वह सप्लाई चेन में खड़ा आखिरी शख्स होता है। मिसाल के तौर पर, अगर दिल्ली का कोई मैन्युफैक्चरर 1 करोड़ रुपये का सामान दिल्ली के ही किसी डिस्ट्रीब्यूटर को बेचता है तो 18 फीसदी जीएसटी (काल्पनिक) के लिहाज से उसे 18 लाख रुपये सरकार को अदा करने होंगे। लेकिन अगर उस मैन्युफैक्चरर को 1 करोड़ के सामान का इनपुट कॉस्ट 60 लाख रुपये पड़ा हो तो उसने पहले ही टैक्स के तौर पर 10.8 लाख रुपये चुका दिए हैं।

ऐसे में डिस्ट्रीब्यूटर को बिक्री के बाद उसे केवल 7.20 लाख (18-10.80) रुपये ही अदा करने होंगे। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। क्योंकि जीएसटी में सेवाएं भी शामिल हैं, तो उसने मैन्युफैक्चरिंग में जो बिजली खर्च की है और उस पर सर्विस टैक्स के रूप में जीएसटी का जो भुगतान किया है, वेयरहाउस के इस्तेमाल का सविर्स टैक्स दिया है और जो दूसरी सविर्सेज के लिए टैक्स दिए हैं, वे सब भी इनपुट टैक्स क्रेडिट के तौर पर उसकी अंतिम देनदारी में से घटेंगे। यह प्रक्रिया फिर डिस्ट्रीब्यूटर से डीलर, डीलर से रीटेलर और रीटेलर से कन्जयूमर तक दोहराई जाएगी।

जीएसटी के फायदे

जीएसटी मौजूदा टैक्स ढांचे की तरह कई जगहों पर न लग कर सिर्फ डेस्टिनेशन पॉइंट पर लगेगा। मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक किसी सामान पर फैक्ट्री से निकलते समय टैक्स लगता है और फिर रीटेल पॉइंट पर भी जब वह बिकता है, तो वहां भी उस पर टैक्स जोड़ा जाता है। जानकारों का मानना है कि टैक्सेशन के नए सिस्टम से जहां भ्रष्टाचार में कमी आएगी, वहीं लालफीताशाही भी कम होगी और पारदर्शिता बढ़ेगी।


सरकार को फायदे:

जीएसटी के तहत टैक्स स्ट्रक्चर आसान होगा और टैक्स बेस बढ़ेगा। इसके दायरे से बहुत कम सामान और सेवाएं बच पाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक जीएसटी व्यवस्था लागू होने के बाद एक्सपोर्ट, रोजगार और आर्थिक विकास में जो बढ़ोतरी होगी, उससे देश को सालाना अरबों रुपये की आमदनी होगी।


आम आदमी के फायदे 

जीएसटी सिस्टम में केंद्र और राज्यों, दोनों के टैक्स सिर्फ बिक्री के समय वसूले जाएंगे। साथ ही ये दोनों ही टैक्स मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट के आधार पर तय होंगे। इससे सामान और सेवाओं के दाम कम होंगे और आम कन्जयूमर को फायदा होगा।


कंपनियों का फायदा

गुड्स और सविर्सेज के दाम कम होने से उनकी खपत बढ़ेगी। इससे कंपनियों का प्रॉफिट बढ़ेगा। इसके अलावा कंपनियों पर टैक्स का औसत बोझ कम होगा। टैक्स सिर्फ बिक्री के पॉइंट पर लगने से प्रॉडक्शन कॉस्ट कम होगी। इससे एक्सपोर्ट मार्केट में कंपनियों की प्रतिस्पर्द्धी क्षमता बढ़ेगी।


जीएसटी से जुड़ी कुछ अहम बातें

1. दुनिया के 140 देशों में लागू है जीएसटी।

2. 1954 में जीएसटी लागू कर फ्रांस ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बना।
3. ज्यादातर देशों में केंद्र और राज्यों का एक जीएसटी (एकल) सिस्टम लागू है।
4. भारत की तरह का ड्युअल जीएसटी सिस्टम ब्राजील और कनाडा में भी है।

लंबी_बहस के बाद आजादी के बाद का 'सबसे बड़ा आर्थिक सुधार' कहे जाने वाला जीएसटी बिल को लोकसभा ने पारित कर दिया। जीएसटी से जुड़े चार बिलों सेंट्रल जीएसटी, इंटीग्रेटेड जीएसटी, यूनियन टेरिटरी जीएसटी और कॉम्पेंसेशन जीएसटी बिलों को लोकसभा ने संशोधनों के बाद पास किया। कल 31 मार्च को जीएसटी काउंसिल की बैठक होगी, इसमें जीएसटी के नियमों पर सहमति बनाई जाएगी। इसके बाद अप्रैल में किन टैक्स स्लैब में किस वस्तु को रखा जाएगा, उस पर फैसला लिया जाएगा। इनके लिए संसद की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी।

⏩ क्या है यूरोपीय संघ

ब्रिटेन को छोड़ कर यूरोपीय संघ देश के 27 नेता रोम की संधि पर हस्‍ताक्षर होने के 60 साल पूरे होने पर इटली की राजधानी रोम में मिल रहे हैं। ये देश 1957 की संधि के सम्‍मान में एक नए घोषणा पत्र पर हस्‍ताक्षर करेंगे। 1957 की संधि से यूरोपीय संघ की नींव का मार्ग प्रशस्‍त हुआ था।

यूरोपीय संघ की आधारशिला कही जाने वाली रोम-संधि की हीरक जयंती मनाने के लिए संघ के सदस्य देशों के शीर्ष नेता रोम में ही मिल-बैठेंगे। अपने शिखर सम्मेलन के दौरान वे संघ के भविष्य के बारे में एक संयुक्त घोषणा भी पारित करेंगे। माना जा रहा है कि इस घोषणा में संघ के शेष बचे 27 सदस्य देशों के बीच एकजुटता बनाए रखने लायक सर्वमान्य सही शब्दों का चयन टेढ़ी खीर बन सकता है।

यूरोपीय संघ की वर्तमान अशोभनीय दशा, उसके सदस्य देशों को जोड़ने वाले कारकों और उसके भावी स्वरूप की रूपरेखा के बारे में सभी देश एकमत नहीं हैं। कुछ देश जुड़ाव की गति को बहुत चुस्त तो कुछ दूसरे बहुत सुस्त मानते हैं। कुछ राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों को लेकर चितित हैं, तो कुछ अपनी राष्ट्रीय प्रभुसत्ता की अक्षुण्णता के लिए चिंतित हैं।

यूरोपीय संघ का निर्माण:

यूरोपीय संघ का अस्तित्व 25 मार्च 1957 को इटली की राजधानी रोम में जिस संधि के साथ शुरू हुई, उसके बारे में कोई जनमतसंग्रह नहीं हुआ। उस समय के मतसर्वेक्षणों के अनुसार सभी छह संधिकर्ता देशों की जनता का बहुमत संधि के पक्ष में था। ये देश थे बेल्जियम, तत्कालीन पश्चिम जर्मनी, फ्रांस, इटली, लग्ज़म्बर्ग और नीदरलैंड (हॉलैंड).

द्वितीय विश्वयुद्ध का अंत हुए उस समय केवल 12 साल बीते थे। सभी देश युद्ध से जर्जर थे। वे पुनर्निर्माण के लिए समय और शांति चाहते थे। वे डर रहे थे कि कहीं ऐसा न हो कि विश्वयुद्ध के कुछ ही समय बाद त्तत्कालीन सोवियत संघ के नेतृत्व वाले पूर्वी गुट और अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी गुट के बीच बढ़ते हुए तनावों का जो ‘शीतयुद्ध’ छिड़ गया था, वह कहीं फिर से गरमा न जाए।

युद्ध से जर्जर अर्थव्यवस्था को फिर पटरी पर लाने के लिए आपसी सहयोग अनिवार्य लग रहा था। इसलिए रोम संधि के माध्यम से दो संस्थाओं का गठन किया गया। एक का नाम था ‘यूरोपीय आर्थिक समुदाय’ (ईईसी), जिसे यूरोपीय साझा बाज़ार भी कहा जाता था, और दूसरी का नाम था ‘यूरोपीय परमाणु समुदाय’ (यूराटोम). ‘यूरोपीय आर्थिक समुदाय’ का लक्ष्य था संधिकर्ता देशों के बीच वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और श्रम का आना-जाना इस तरह सुगम बनाना, मानो सभी देश मिल कर एक ऐेसा साझा बाज़ार बन गये हैं, जहां कारोबार और व्यापार के एक ही जैसे नियम-कानून हैं।

यूरोपीय एकता की धीमी रफ्तार:

1973 तक नौ देश इस समुदाय के सदस्य बन चुके थे। 14 दिसंबर 1973 को उन्होने ‘यूरोपीय अस्मिता’ के नाम वाला एक घोषणापत्र पारित किया। इसमें ‘यूरोपीय एकता’ की गति को और तेज़ करना और उसे ’यूरोपीय संघ’ (ईयू) का रूप देना मूल लक्ष्य घोषित किया गया था। लेकिन यह गति मुख्यतः ब्रिटेन द्वारा अपने लिए नित नयी रियायतें मांगने के कारण 1980 वाले दशक के अंतिम वर्षों से पहले तेज़ नहीं हो पायी।

1987 में एक ऐसे सच्चे साझे बाज़ार की रूपरेखा पेश की गई, जिसमें - सभी सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं में समरूपता लाते हुए - निर्बाध व्यापार और कारोबार की सारी अड़चनें 1992 के अंत तक दूर कर देने का प्रावधान था। सात फ़रवरी 1992 को, नीदरलैंड के मासत्रिश्त शहर में ‘यूरोपीय समुदाय’ को किसी संघराज्य जैसे ‘यूरोपीय संघ’ का रूप देने की संधि पर विधिवत हस्ताक्षर हुए। यह नयी संधि एक नवंबर 1993 से लागू हो गई।

इसी संधि में संघ के सदस्य देशों में उस साझी मुद्रा के प्रचलन का भी लक्ष्य तय किया गया था, जिसे बाद में ‘यूरो’ के रूप में अब तक 19 सदस्य देश और भूतपूर्व युगोस्लाविया वाले मोंटेनेग्रो जैसे कुछेक गैर-सदस्य देश भी अपना चुके हैं। बाद के वर्षों में एम्सटर्डम संधि (1997), नीस संधि (2003) और लिस्बन संधि (2007) के माध्यम से यूरोपीय संघ फलता-फूलता रहा। उसमें ब्रिटेन सहित 28 देश हो गए।

यूरोपीय संघ में अलगाव के कारण:

यूरोपीय संघ की एक सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसका अपना कोई संविधान नहीं है। इसलिए उसकी कार्यविधि में कोई परिवर्तन या कोई नया अध्याय शुरू करने से पहले एक नयी संधि करनी पड़ती है। पिछले दशक के मध्य में फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति जिस्कार द’ एस्तां के नेतृत्व में एक संविधान बना तो था, पर उसके अनुमोदन के लिए हुए जनमतसंग्रह में स्वयं फ्रांस की जनता ने ही उसे ठुकरा दिया।

यही हाल नीदरलैंड में भी हुआ। अंततः संविधान को रद्दी की टोकरी के हवाले कर देना पड़ा। संधियों के साथ सुविधा यह है कि वे बार-बार की जा सकती हैं।

यूोरोपीय संघ का अंतिम स्वरूप क्या हो?

1957 की ‘यूरोपीय आर्थिक समुदाय’ वाली संधि की भूमिका में लिखा है कि इस समुदाय का लक्ष्य यूरोपीय राष्ट्रों को निरंतर करीब लाना है। बाद की सभी संधियों में भी इसी लक्ष्य को दुहराया गया है। पर, कभी यह नहीं कहा गया कि निरंतर निकटता का अंतिम स्वरूप क्या होगा? इसलिए कुछ लोग चाहते हैं कि यूरोपीय संघ के आज के राष्ट्र-राज्यों का स्थान एक दिन अमेरिका की तरह के ‘संयुक्त राज्य यूरोप’ जैसे किसी नाम वाले महादेश को ले लेना चाहिये, तो कुछ चाहते हैं कि उसे केवल एक बड़ा-सा मुक्त व्यापार क्षेत्र ही बने रहना चाहिये।

यूरोपीय संघ का प्रशासन:

यूरोपीय संघ अपने कई प्रशासनिक एवं अन्य इकाइयों द्वारा संचालित होता है, जिनमें मुख्य रूप से काउंसिल ऑफ यूरोपियन यूनियन, यूरोपियन कमीशन, एवं यूरोपियन पार्लियामेंट सबसे प्रमुख हैं।

यूरोपीय आयोग संघ के प्रमुख कार्यकारी अंग के तौर पर काम करता है और इसके दैनंदिन कामों की जिम्मेवारी इसी पर होती है जिसे इसके 27 कमीश्नर संचालित करते हैं जो 27 सदस्य राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस आयोग के अध्यक्ष एवं सभी 27 प्रतिनिधि यूरोपीय परिषद द्वारा नामित किये जाते हैं। अध्यक्ष एवं सभी 27 प्रतिनिधियों की नियुक्ति पर यूरोपीय संसद की मंजूरी आवश्यक होती है।

यूरोपीय परिषद (यूरोपियन काउंसिल) जिसे काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स के नाम से भी जाना जाता है, के आधे सदस्य संघ की न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा होते है। न्यायिक कामों के अलावा परिषद विदेश एवं सुरक्षा नीतियों के कार्यान्वण एवं निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

यूरोपीय संघ में उच्च स्तर के राजनैतिक निर्णय के लिए नेतृत्व यूरोपीय काउंसिल अर्थात यूरोपीय परिषद द्वारा किया जाता है। यूरोपीय परिषद की बैठक साल में चार बार होती है एवं इसकी अध्यक्षता उस साल यूरोपीय संघ का अध्यक्ष राष्ट्रप्रमुख करता है जिसका मुख्य कार्य यूरोपीय संघ की नीतियों के अनुरूप काम करना एवं भविष्य के लिए दिशा निर्देश जारी करना होता है।

यूरोपीय संघ की अध्यक्षता का कार्य हर सदस्य देश के जिम्मे रोटेटिंग आधार पर छह महीने के लिए आता है, इस दौरान यूरोपियन काउंसिल एवं काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स के हर बैठक की जिम्मेवारी उस सदस्य राष्ट्र पर होती है। अध्यक्षता के दौरान अध्यक्ष राष्ट्र अपने खास एजेंडों पर ध्यान देता है जिसमे आम तौर पर आर्थिक एजेंडा, यूरोपीय संघ में सुधार एवं संघ के विस्तार एवं एकीकरण के मुद्दे खास होते हैं।

यूरोपीय संघ के न्यायिक प्रक्रिया का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा यूरोपीय संसद होती है। यूरोपीय संसद के सदस्य के 785 सदस्य हर पांच वर्ष में यूरोपीय संघ की जनता द्वारा सीधे चुने जाते हैं। हलांकि इन सदस्यों का चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर होता है परंतु यूरोपीय संसद में वे अपनी राष्ट्रीयता के अनुसार न बैठकर दलानुसार बैठते हैं। हर सदस्य राष्ट्र के लिए सीटों की एक निश्चित संख्या आवंटित होती है।

यूरोपीय संघ का 60वां जन्मदिन:

ब्रिटेन को छोड़ कर यूरोपीय संघ देश के 27 नेता रोम की संधि पर हस्‍ताक्षर होने के 60 साल पूरे होने पर इटली की राजधानी रोम में मिल रहे हैं। ये देश 1957 की संधि के सम्‍मान में एक नए घोषणा पत्र पर हस्‍ताक्षर करेंगे। 1957 की संधि से यूरोपीय संघ की नींव का मार्ग प्रशस्‍त हुआ था।

यूरोपीय संघ की आधारशिला कही जाने वाली रोम-संधि की हीरक जयंती मनाने के लिए संघ के सदस्य देशों के शीर्ष नेता रोम में ही मिल-बैठेंगे। अपने शिखर सम्मेलन के दौरान वे संघ के भविष्य के बारे में एक संयुक्त घोषणा भी पारित करेंगे। माना जा रहा है कि इस घोषणा में संघ के शेष बचे 27 सदस्य देशों के बीच एकजुटता बनाए रखने लायक सर्वमान्य सही शब्दों का चयन टेढ़ी खीर बन सकता है।

यूरोपीय संघ की वर्तमान अशोभनीय दशा, उसके सदस्य देशों को जोड़ने वाले कारकों और उसके भावी स्वरूप की रूपरेखा के बारे में सभी देश एकमत नहीं हैं। कुछ देश जुड़ाव की गति को बहुत चुस्त तो कुछ दूसरे बहुत सुस्त मानते हैं। कुछ राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों को लेकर चितित हैं, तो कुछ अपनी राष्ट्रीय प्रभुसत्ता की अक्षुण्णता के लिए चिंतित हैं।

यूरोपीय संघ का निर्माण:

यूरोपीय संघ का अस्तित्व 25 मार्च 1957 को इटली की राजधानी रोम में जिस संधि के साथ शुरू हुई, उसके बारे में कोई जनमतसंग्रह नहीं हुआ। उस समय के मतसर्वेक्षणों के अनुसार सभी छह संधिकर्ता देशों की जनता का बहुमत संधि के पक्ष में था। ये देश थे बेल्जियम, तत्कालीन पश्चिम जर्मनी, फ्रांस, इटली, लग्ज़म्बर्ग और नीदरलैंड (हॉलैंड).

द्वितीय विश्वयुद्ध का अंत हुए उस समय केवल 12 साल बीते थे। सभी देश युद्ध से जर्जर थे। वे पुनर्निर्माण के लिए समय और शांति चाहते थे। वे डर रहे थे कि कहीं ऐसा न हो कि विश्वयुद्ध के कुछ ही समय बाद त्तत्कालीन सोवियत संघ के नेतृत्व वाले पूर्वी गुट और अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी गुट के बीच बढ़ते हुए तनावों का जो ‘शीतयुद्ध’ छिड़ गया था, वह कहीं फिर से गरमा न जाए।

युद्ध से जर्जर अर्थव्यवस्था को फिर पटरी पर लाने के लिए आपसी सहयोग अनिवार्य लग रहा था। इसलिए रोम संधि के माध्यम से दो संस्थाओं का गठन किया गया। एक का नाम था ‘यूरोपीय आर्थिक समुदाय’ (ईईसी), जिसे यूरोपीय साझा बाज़ार भी कहा जाता था, और दूसरी का नाम था ‘यूरोपीय परमाणु समुदाय’ (यूराटोम). ‘यूरोपीय आर्थिक समुदाय’ का लक्ष्य था संधिकर्ता देशों के बीच वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और श्रम का आना-जाना इस तरह सुगम बनाना, मानो सभी देश मिल कर एक ऐेसा साझा बाज़ार बन गये हैं, जहां कारोबार और व्यापार के एक ही जैसे नियम-कानून हैं।

यूरोपीय एकता की धीमी रफ्तार:

1973 तक नौ देश इस समुदाय के सदस्य बन चुके थे। 14 दिसंबर 1973 को उन्होने ‘यूरोपीय अस्मिता’ के नाम वाला एक घोषणापत्र पारित किया। इसमें ‘यूरोपीय एकता’ की गति को और तेज़ करना और उसे ’यूरोपीय संघ’ (ईयू) का रूप देना मूल लक्ष्य घोषित किया गया था। लेकिन यह गति मुख्यतः ब्रिटेन द्वारा अपने लिए नित नयी रियायतें मांगने के कारण 1980 वाले दशक के अंतिम वर्षों से पहले तेज़ नहीं हो पायी।

1987 में एक ऐसे सच्चे साझे बाज़ार की रूपरेखा पेश की गई, जिसमें - सभी सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं में समरूपता लाते हुए - निर्बाध व्यापार और कारोबार की सारी अड़चनें 1992 के अंत तक दूर कर देने का प्रावधान था। सात फ़रवरी 1992 को, नीदरलैंड के मासत्रिश्त शहर में ‘यूरोपीय समुदाय’ को किसी संघराज्य जैसे ‘यूरोपीय संघ’ का रूप देने की संधि पर विधिवत हस्ताक्षर हुए। यह नयी संधि एक नवंबर 1993 से लागू हो गई।

इसी संधि में संघ के सदस्य देशों में उस साझी मुद्रा के प्रचलन का भी लक्ष्य तय किया गया था, जिसे बाद में ‘यूरो’ के रूप में अब तक 19 सदस्य देश और भूतपूर्व युगोस्लाविया वाले मोंटेनेग्रो जैसे कुछेक गैर-सदस्य देश भी अपना चुके हैं। बाद के वर्षों में एम्सटर्डम संधि (1997), नीस संधि (2003) और लिस्बन संधि (2007) के माध्यम से यूरोपीय संघ फलता-फूलता रहा। उसमें ब्रिटेन सहित 28 देश हो गए।

यूरोपीय संघ में अलगाव के कारण:

यूरोपीय संघ की एक सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसका अपना कोई संविधान नहीं है। इसलिए उसकी कार्यविधि में कोई परिवर्तन या कोई नया अध्याय शुरू करने से पहले एक नयी संधि करनी पड़ती है। पिछले दशक के मध्य में फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति जिस्कार द’ एस्तां के नेतृत्व में एक संविधान बना तो था, पर उसके अनुमोदन के लिए हुए जनमतसंग्रह में स्वयं फ्रांस की जनता ने ही उसे ठुकरा दिया।

यही हाल नीदरलैंड में भी हुआ। अंततः संविधान को रद्दी की टोकरी के हवाले कर देना पड़ा। संधियों के साथ सुविधा यह है कि वे बार-बार की जा सकती हैं।

यूोरोपीय संघ का अंतिम स्वरूप क्या हो?

1957 की ‘यूरोपीय आर्थिक समुदाय’ वाली संधि की भूमिका में लिखा है कि इस समुदाय का लक्ष्य यूरोपीय राष्ट्रों को निरंतर करीब लाना है। बाद की सभी संधियों में भी इसी लक्ष्य को दुहराया गया है। पर, कभी यह नहीं कहा गया कि निरंतर निकटता का अंतिम स्वरूप क्या होगा? इसलिए कुछ लोग चाहते हैं कि यूरोपीय संघ के आज के राष्ट्र-राज्यों का स्थान एक दिन अमेरिका की तरह के ‘संयुक्त राज्य यूरोप’ जैसे किसी नाम वाले महादेश को ले लेना चाहिये, तो कुछ चाहते हैं कि उसे केवल एक बड़ा-सा मुक्त व्यापार क्षेत्र ही बने रहना चाहिये।

यूरोपीय संघ का प्रशासन:

यूरोपीय संघ अपने कई प्रशासनिक एवं अन्य इकाइयों द्वारा संचालित होता है, जिनमें मुख्य रूप से काउंसिल ऑफ यूरोपियन यूनियन, यूरोपियन कमीशन, एवं यूरोपियन पार्लियामेंट सबसे प्रमुख हैं।

यूरोपीय आयोग संघ के प्रमुख कार्यकारी अंग के तौर पर काम करता है और इसके दैनंदिन कामों की जिम्मेवारी इसी पर होती है जिसे इसके 27 कमीश्नर संचालित करते हैं जो 27 सदस्य राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस आयोग के अध्यक्ष एवं सभी 27 प्रतिनिधि यूरोपीय परिषद द्वारा नामित किये जाते हैं। अध्यक्ष एवं सभी 27 प्रतिनिधियों की नियुक्ति पर यूरोपीय संसद की मंजूरी आवश्यक होती है।

यूरोपीय परिषद (यूरोपियन काउंसिल) जिसे काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स के नाम से भी जाना जाता है, के आधे सदस्य संघ की न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा होते है। न्यायिक कामों के अलावा परिषद विदेश एवं सुरक्षा नीतियों के कार्यान्वण एवं निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

यूरोपीय संघ में उच्च स्तर के राजनैतिक निर्णय के लिए नेतृत्व यूरोपीय काउंसिल अर्थात यूरोपीय परिषद द्वारा किया जाता है। यूरोपीय परिषद की बैठक साल में चार बार होती है एवं इसकी अध्यक्षता उस साल यूरोपीय संघ का अध्यक्ष राष्ट्रप्रमुख करता है जिसका मुख्य कार्य यूरोपीय संघ की नीतियों के अनुरूप काम करना एवं भविष्य के लिए दिशा निर्देश जारी करना होता है।

यूरोपीय संघ की अध्यक्षता का कार्य हर सदस्य देश के जिम्मे रोटेटिंग आधार पर छह महीने के लिए आता है, इस दौरान यूरोपियन काउंसिल एवं काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स के हर बैठक की जिम्मेवारी उस सदस्य राष्ट्र पर होती है। अध्यक्षता के दौरान अध्यक्ष राष्ट्र अपने खास एजेंडों पर ध्यान देता है जिसमे आम तौर पर आर्थिक एजेंडा, यूरोपीय संघ में सुधार एवं संघ के विस्तार एवं एकीकरण के मुद्दे खास होते हैं।

यूरोपीय संघ के न्यायिक प्रक्रिया का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा यूरोपीय संसद होती है। यूरोपीय संसद के सदस्य के 785 सदस्य हर पांच वर्ष में यूरोपीय संघ की जनता द्वारा सीधे चुने जाते हैं। हलांकि इन सदस्यों का चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर होता है परंतु यूरोपीय संसद में वे अपनी राष्ट्रीयता के अनुसार न बैठकर दलानुसार बैठते हैं। हर सदस्य राष्ट्र के लिए सीटों की एक निश्चित संख्या आवंटित होती है

Wednesday, 29 March 2017

#Editorial_The_Hindu 


Hate_bubbles_over ( नफरत बुलबुले के ऊपर )


The murder (हत्या) of an Indian in a hate crime poses uncomfortable questions to Team Trump

News of the killing of Indian national Srinivas Kuchibhotla in Kansas has shocked India, and raised fears about the safety of foreigners and immigrants (अप्रवासियों) in America. The term “hate crime” is writ large in the minds of the Indian_diaspora (भारतीय मूल) in the U.S. and their anxious (चिंतित) families back home, even as law enforcement (प्रवर्तन) officials piece together the #tragic (दुःखद) events at a bar in Kansas City. That prior to the attack the shooter, U.S. military veteran (दिग्गज) Adam Purinton, reportedly (कथित) asked Kuchibhotla and his co-worker and fellow Indian, Alok Madasani, whether they were residing in the U.S. illegally hints at the possible motivation for the violent encounter. Eyewitness reports confirming that the killer yelled (चिल्लाना) , “Get out of my country,” moments before unleashing a hail_of_bullets (गोलियों की बौछार) on the two Indians, also injuring a white man who sought to intervene (हस्तक्षऐप) on their behalf, suggests a xenophobic_racism (अज्ञातव्यक्तिभीत नस्लवाद) . While this may be an isolated (अलग)  instance_of_hate_crime (एक अलग क्राइम का उदाहरण) , given the political_climate (राजनीतिक माहौल) in the U.S., it cannot but shine a spotlight (लाइट फोकसिंग मशीन) on President Donald Trump’s anti-immigrans actions. Especially after Mr. Trump’s executive order banning entry into the U.S. of travellers from seven Muslim-majority countries and refugees (शरणार्थी) from Syria and indefinitely putting on hold the country’s refugee asylum (शरणार्थी अस्पताल) programme even if implementation (कार्यान्वयन) of the order has been limited, so far.

Fear-mongering about America’s weak borders allowing the unconstrained (स्वेच्छापुर्ण) entry of “illegal aliens” into the country has a much older provenance. Throughout the bruising (जोरदार) two-year election campaign that culminated (समापन हुवा ) in the November presidential election, Mr. Trump’s provocative (उत्तेजक) arguments (दलील) about building a wall along the Mexican border and banning Muslims from entering the U.S went largely unchallenged by the Republican Party. Last week, around the same time as the attack in Kansas City, Mr. Trump tweeted about seven people shot dead in Chicago, #pointing ( इशारा ) an unsubtle finger at violence ( हिंसा ) in inner cities associated with African-Americans in poverty. He did not tweet on the Kansas attack. The White House was quick to dismiss as absurd (बेतुका)” any link between the Kansas City shooting and the rhetoric (बयानबाजी) on undocumented immigrants. That may well be, but the selective social media outrage of Mr. Trump on violent acts across the U.S. is disturbing . Why, for instance (उदाहरण), did his administration not condemn (निंदा) that act of violence more explicitly (स्पष्ट रूप से )? Given Republican obstructionism on enacting common-sense gun control reforms to curb the #proliferation (प्रसार) of deadly_weapons (घातक हथियार) , this intensifying (तेज)  trend (प्रवृति) of racist_xenophobia ( विदेशी लोंगो को नापसंद करने की जातिवादी भावना) may make the U.S. a far more dangerous emigration (प्रवासी) destination (गंतव्य) than it has been so far. Srinivas Kuchibhotla’s career was the stuff of the American dream. Mr. Trump’s politics risks alienating (अलगाववाद की भावना) not just immigrants, but also native_born ( देसी अवतार) Americans from that dream.


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